किस्से नवागढ़ के | Audio Story Series

kissenawagarhke

नवागढ़, छत्तीसगढ़ के 36 गढ़ों में से एक।
जहाँ धान के खेतों की महक रात में भी नहीं मिटती।
जहाँ महामाया देवी का प्राचीन मंदिर है और उसके ठीक पीछे एक टिला – लोग कहते हैं वो राममहल था, और चारों तरफ गड्ढे में आज भी पानी खड़ा रहता है, जैसे कोई जल प्रहरी हो।
रमेश, नवागढ़ का मूल निवासी, 50 साल की उम्र में जब अपने बचपन को याद करता है तो उसकी रीढ़ में अभी भी ठंडक दौड़ जाती है।
7 साल की उम्र में उसने सबसे पहले चटिया मटिया को देखा था – दो बौने, कांवर में टोकरी, जो भोजन चुराते थे।
फिर उसके चाचा के लड़के की मौत के बाद छप्पर पर कंकड़ गिरने लगे।
फिर मौसी के साथ कुंए में डूबी औरत जो गायब हो गई।
फिर मुंगेली रोड पर सफेद कपड़ों वाला आदमी जो कभी बाईं, कभी दाईं तरफ होता था और पास आते ही गायब।
और सबसे आखिर में – अपनी साड़ी में पेशाब करते हुए उसने दो बाघ गुर्राते हुए देखे, जिनकी नजर उसकी तरफ नहीं थी।
हर घटना अलग थी।
हर घटना सच्ची थी।
और हर घटना एक ही श्राप से जुड़ी थी – नरवरगढ़ के राजा का पुराना अन्याय, जिसका बदला महामाया देवी आज भी ले रही हैं।
रमेश अब टिले पर खड़ा होकर पूछता है –
ये श्राप था?
या हमारी मिट्टी ने अपने अपराध छिपाने के लिए भूतिया कहानियाँ गढ़ ली थीं?
तुम यकीन नहीं करोगे…
लेकिन कसम से, ये सब मेरे साथ हुआ है।

कहानी सारांश

मेरा नाम रमेश है। नवागढ़, छत्तीसगढ़।

यहाँ की मिट्टी में कुछ ऐसा घुला है जो कभी पूरी तरह सूखता नहीं।

लोग कहते हैं – नरवरगढ़ के राजा ने एक गरीब परिवार का सब कुछ छीन लिया था। राजा की रानी ने आत्महत्या कर ली, राजकुमार की हत्या हुई, और महामाया देवी ने श्राप दिया – “जब तक तुम्हारा अन्याय मिट्टी में नहीं घुल जाएगा, तब तक हर पीढ़ी में मेरे वाहन आएँगे। कभी चटिया मटिया बनकर, कभी कंकड़ बनकर, कभी प्रेतिन बनकर, कभी सफेद साया बनकर, और कभी बाघ बनकर।”

मैंने इन पाँच रूपों को अपनी आँखों से देखा है।

पहले सात एपिसोड में मैं बचपन की चटिया मटिया वाली घटनाओं को खोलता हूँ – भोजन की चोरी, नागफनी-अंगार का रिवाज, बाड़े में बौनों का दर्शन, गांव की अफवाहें, और पहली बार जब मुझे लगा कि ये चोरी अपराध नहीं, बदला है।

छप्पर पर कंकड़ गिरते हैं। चाचा का बेटा मरता है। परिवार अनुष्ठान करता है, लेकिन आवाजें रुकती नहीं। मैं थ्योरी लगाता हूँ – ये राजकुमार का भूत है जो न्याय माँग रहा है।

कुंए की प्रेतिन आती है। मौसी के साथ दोपहर में मैंने खुद देखा – पानी में डूबी औरत, सिर्फ सिर दिखता है, फिर गायब। नाना कहते हैं “परेतिन है”, लेकिन मैं जानता हूँ कि ये राजा की रानी का रूप है।

मुंगेली रोड का सफेद भूत। फिल्म से लौटते समय मैं और मेरा दोस्त उसे देखते हैं। वह कभी बाईं, कभी दाईं। पास आते ही गायब। अगले दिन जी बताते हैं – “उसका रेंज सिर्फ आधा किलोमीटर है। वो गढ़ के रहस्य की रखवाली करता है।”

सबसे डरावनी घटना – रात में बाड़ी में पेशाब करते हुए मैंने दो बाघ गुर्राते देखे। परिवार आता है, 500 मीटर तक ढूँढते हैं, कुछ नहीं मिलता। बुजुर्ग कहते हैं – “ये महामाया का वाहन है। यदा-कदा दिखता है।”

मैं आखिरी बार टिले पर जाता हूँ।

महामाया मंदिर में शाम की आरती होती है।

मैं बुजुर्गों से तीन अंतिम थ्योरी सुनता हूँ –

श्राप सच है,

अपराध छिपाने के लिए कहानियाँ गढ़ी गईं,

या दोनों एक साथ हैं।

मैं मंदिर के सामने खड़ा होकर कहता हूँ:

“मैंने सब देखा।

चटिया मटिया से लेकर बाघ तक।

लेकिन आज भी मैं नहीं जानता कि ये देवी का श्राप था या हमारी मिट्टी ने अपने पाप छिपाने के लिए ये किस्से रच दिए।

पर एक बात पक्की है –

नवागढ़ में रात अभी भी पूरी तरह अँधेरी नहीं होती।

कहीं न कहीं से या तो कंकड़ गिरता है, या बाघ गुर्राता है, या सफेद साया चलता है।

और जब भी ऐसा होता है, मुझे लगता है…

महामाया अभी भी देख रही है।”

दूर से हल्की सी गुर्राहट आती है।

मैं मुस्कुराता हूँ।

“देखा?

मिट्टी अभी भी बोल रही है।”

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