नीति के दोहा
करना धरना कुछ नहीं, काँव-काँव चिल्लाय ।
खिंचे दूसर के पाँव ला, हक भर अपन जताय ।।
अपन काम सहि काम नहीं, नाम जेखरे कर्म ।
छोड़ बात अधिकार के, काम करब हे धर्म ।।
कहां कोन छोटे बड़े, सबके अपने मान ।
अपन हाथ के काम बिन, फोकट हे सब ज्ञान ।।
जीये बर तैं काम कर, कामे बर मत जीय ।
पइसा ले तो हे बडे, अपन मया अउ हीय ।।
ए हक अउ अधिकार मा, कोन बड़े हे देख ।
जान बचावब मारना, अइसन बात सरेख ।।
-रमेश चौहान

गजब नीक… नीति के दोहा – ए हक अउ अधिकार मा, कोन बड़े हे देख। जान बचावब मारना, अइसन बात सरेख।।